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National/State02 Jun 2026, 08:00 pm

साझा नदियों पर भारत-बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय तंत्र सक्रिय: विदेश मंत्रालय

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साझा नदियों पर भारत-बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय तंत्र सक्रिय: विदेश मंत्रालय

• गंगा जल संधि का नवीनीकरण अहम • 54 नदियों पर संयुक्त आयोग सक्रिय • सूखे मौसम में जल बंटवारे की चुनौती • द्विपक्षीय सहयोग से समाधान संभव विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा नदियों से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए एक स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है। 54 साझा नदियों के लिए एक संयुक्त नदी आयोग कार्यरत है। गंगा जल बंटवारे की संधि, जो 2026 में समाप्त हो रही है, पर मौजूदा सहयोग ढांचे के तहत विचार किया जाएगा। मंत्रालय के अनुसार, द्विपक्षीय सहयोग से इन मुद्दों का समाधान निकाला जाएगा।

• भारत और बांग्लादेश के बीच साझा नदियों के मुद्दों के समाधान हेतु द्विपक्षीय तंत्र सक्रिय • गंगा जल संधि का नवीनीकरण द्विपक्षीय संबंधों में एक प्रमुख एजेंडा • 54 साझा नदियों के प्रबंधन के लिए संयुक्त नदी आयोग निरंतर प्रयासरत • जलवायु परिवर्तन और जल प्रवाह में कमी से जल बंटवारे में आ रही हैं चुनौतियां विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को स्पष्ट किया है कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा नदियों से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने के लिए एक सुस्थापित और सक्रिय द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है। मंत्रालय के अनुसार, गंगा जल बंटवारे की संधि से जुड़े मामलों पर मौजूदा सहयोग के ढांचों के भीतर ही विचार किया जाएगा, जो दोनों देशों के बीच जल संसाधनों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 नदियाँ साझा हैं। इन सभी नदियों से संबंधित मुद्दों, जैसे कि जल प्रवाह, गुणवत्ता और बंटवारा, को हल करने के लिए एक संयुक्त नदी आयोग (Joint Rivers Commission) के रूप में एक संरचित द्विपक्षीय तंत्र निरंतर कार्यरत है। यह आयोग दोनों देशों के बीच जल संबंधी सहयोग को बढ़ावा देने और विवादों को सुलझाने का एक मंच प्रदान करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस संदर्भ में कहा, "हम इन मुद्दों को नदियों पर हमारे संरचित द्विपक्षीय सहयोग के हिस्से के रूप में भी देखेंगे।" यह बयान बांग्लादेश की ओर से गंगा जल-साझाकरण समझौते, जिसे आमतौर पर फरक्का संधि के रूप में जाना जाता है, के नवीनीकरण की आवश्यकता पर जोर देने के बाद आया है। यह संधि, जो दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है, दोनों देशों के बीच जल बंटवारे के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार प्रदान करती है।

1996 में हस्ताक्षरित गंगा जल बंटवारे की संधि ने 30 साल के लिए महत्वपूर्ण शुष्क मौसम (जनवरी से मई) के दौरान गंगा जल के बंटवारे के लिए एक ढांचा स्थापित किया था। इस संधि के तहत, फरक्का में 10-दिवसीय प्रवाह माप के आधार पर, कुछ निश्चित परिस्थितियों में प्रत्येक देश को न्यूनतम 35,000 क्यूसेक जल की गारंटी दी गई थी। इस संधि का कार्यान्वयन एक संयुक्त समिति द्वारा किया जाता है, जो विवादों को हल करने के लिए भी जिम्मेदार है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर में वृद्धि और भारत के राज्यों में ऊपरी जल उपयोग में बढ़ोतरी के कारण, शुष्क मौसम में गंगा का जल प्रवाह काफी कम हो गया है। इस स्थिति ने जल आवंटन को निर्धारित मानकों के अनुसार पूरा करना एक बड़ी चुनौती बना दिया है। बांग्लादेश ने अक्सर यह आरोप लगाया है कि उसे विशेष रूप से सूखे वर्षों में उसके हिस्से से कम पानी प्राप्त होता है, जबकि भारत अपनी ओर से जल-विज्ञान संबंधी बाधाओं और प्राकृतिक प्रवाह में कमी का हवाला देता रहा है।

गंगा जल संधि के समाप्त होने की कगार पर होने के कारण, इसके नवीनीकरण की प्रक्रिया भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय जुड़ाव में एक प्रमुख और संवेदनशील मुद्दा रहने की उम्मीद है। दोनों देश इस संधि के नवीनीकरण पर चर्चा करने और एक सर्वसम्मति पर पहुंचने के लिए प्रयासरत रहेंगे, ताकि भविष्य में जल बंटवारे को लेकर किसी भी तरह के विवाद से बचा जा सके और दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बने रहें। इस संबंध में, दोनों देशों के जल संसाधन मंत्रियों और संबंधित अधिकारियों के बीच नियमित बैठकें और परामर्श जारी रहने की संभावना है।

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