दिल्ली के सेंट्रल रिज पर 'बहाली' के नाम पर नष्ट हो रहे मिट्टी के 'रासायनिक इंजीनियर'
• नाजुक बायोक्रेस्ट्स को पहुंचा नुकसान • वन विभाग ने रसायनों पर लगाई रोक • मौके पर मिट्टी की स्थिति चिंताजनक • बहाली के तरीकों पर पुनर्विचार आवश्यक ने दिल्ली के सेंट्रल रिज पर चल रही 'बहाली' परियोजनाओं पर चिंता जताई है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, वन विभाग द्वारा प्रस्तावित कीटनाशक उपचार से मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और बायोक्रेस्ट्स को गंभीर नुकसान पहुंच सकता था। हालांकि, जन outcry के बाद विभाग ने रसायनों का उपयोग रद्द कर दिया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ये बायोक्रेस्ट्स, जिन्हें 'मिट्टी के रासायनिक इंजीनियर' कहा जाता है, शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनके विनाश से मिट्टी की उर्वरता और जल धारण क्षमता प्रभावित हो सकती है।
• दिल्ली के सेंट्रल रिज पर 'बहाली' के नाम पर हो रहा है गंभीर पारिस्थितिक नुकसान, मिट्टी के 'रासायनिक इंजीनियर' खतरे में • वन विभाग ने रसायनों के उपयोग पर लगाई रोक, पर मशीनों से हो रहा है बायोक्रेस्ट्स का विनाश • बायोक्रेस्ट्स: शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़, जो मिट्टी को स्थिर कर जल संरक्षण में करते हैं मदद • विशेषज्ञ चिंतित: बहाली की वर्तमान विधियों से मिट्टी का जीवन नष्ट हो रहा है, तत्काल बदलाव की मांग ने दिल्ली के सेंट्रल रिज क्षेत्र में चल रही 'बहाली' परियोजनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाल ही में, वन विभाग द्वारा एक टेंडर में एंटी-टर्मिट उपचार के लिए क्लोरपाइरीफोस और लिंडेन जैसे खतरनाक रसायनों के उपयोग का प्रस्ताव था। यह प्रस्ताव मिट्टी में मौजूद सभी सूक्ष्मजीवों, कवकों और बायोक्रेस्ट्स के लिए विनाशकारी साबित हो सकता था, जिन्हें शुष्क भूमि पारिस्थितिकी तंत्र का 'रासायनिक इंजीनियर' माना जाता है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इस प्रस्ताव के सार्वजनिक होने पर मीडिया और नागरिक समाज द्वारा कड़ी आलोचना की गई। इसके परिणामस्वरूप, वन विभाग ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए रसायनों के उपयोग वाले टेंडर को रद्द कर दिया है। यह एक बड़ी त्रासदी को टालने जैसा था, क्योंकि इन रसायनों से रिज की सबसे बड़ी संपत्ति, यानी जीवित मिट्टी, नष्ट हो सकती थी। इस घटना ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे अनजाने में पारिस्थितिक विनाश हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बायोक्रेस्ट्स, जो साइनोबैक्टीरिया, शैवाल, कवक और लाइकेन जैसे सूक्ष्मजीवों के जटिल समुदाय हैं, मिट्टी के कणों को बांधकर एक स्पंज जैसी संरचना बनाते हैं। यह संरचना न केवल मिट्टी को स्थिर करती है, बल्कि जल संरक्षण और वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये जीव 'मरुस्थलीय मिट्टी की जीवित त्वचा' के रूप में कार्य करते हैं। इन 'जीवित त्वचा' की बहाली में दशकों लग सकते हैं, और इन्हें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से बचाना अत्यंत आवश्यक है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, एक पतली परत को ठीक होने में 5 साल लग सकते हैं, जबकि उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में 20 साल और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 250 साल तक लग सकते हैं, बशर्ते कि क्षेत्र में फिर से कोई व्यवधान न हो।
हालांकि विभाग ने रसायनों का उपयोग रोक दिया है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या अतीत में भी ऐसे रसायनों का प्रयोग किया गया है? साथ ही, 'विलायती कीकर' जैसे आक्रामक पौधों को हटाने के लिए गहरी जुताई और मशीनों का उपयोग भी इन नाजुक बायोक्रेस्ट्स को नुकसान पहुंचा रहा है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, विभाग को अपनी बहाली की विधियों पर पुनर्विचार करने और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता है। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि भारी मशीनें मिट्टी को उलट-पलट रही हैं, जिससे मिट्टी की ऊपरी परत बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
वन विभाग के प्रबंधन योजनाओं में अक्सर बायोक्रेस्ट्स और कवकों जैसे महत्वपूर्ण घटकों का उल्लेख नहीं होता है, क्योंकि वे अभी तक वनपालों की नजर में नहीं आए हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि ये सूक्ष्मजीव मिट्टी प्रणाली में ऊर्जा प्रवाह का 90 प्रतिशत तक संभालते हैं। विभाग को इन 'रासायनिक इंजीनियरों' को महत्व देना होगा और उनके विनाश को तुरंत रोकना होगा। भविष्य की बहाली परियोजनाओं में बायोक्रेस्ट्स के संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


